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बाला साहेब ठाकरे एक मजबूत व्यक्तित्व और स्पष्ट मत वाले नेता थे। वह महाराष्ट्र की जनता के लिये ना सिर्फ एक नेता थे बल्कि महानायक थे। प्रभाव ऐसा कि एक आवाज पर पुरा महाराष्ट्र बंद करवा दें। 93 दंगो में जब समुदाय विशेष आतंक के चरम पर था और शासन रोकने में असफल रहा इन्हें तब बालासाहेब के कहने पर ही शिवसैनिक सड़कों पर उतरे और इतना आक्रामक जबाव दिया कि समुदाय विशेष सीधी लड़ाई छोड़ बॉम्ब ब्लास्ट पर उतर आया। बाबरी ढायी गयी तब जब सब पल्ला झाड़ रहे थे तब आगे बढकर बाला साहेब ही थे जिन्होंने कहा कि बाबरी गिराने वाले हम थे। इसके बाद वह महाराष्ट्र ही नहीं अपितु पुरे राष्ट्र में हिंदू हृदय सम्राट कहलाये। उनकी अपने कहे पर मजबूती से टिके रहने की आदत और फर्जी सेक्युलरीज्म के खिलाफ मुखर विरोध आज तक उन्हें भारतीय जनमानस के हृदय में जीवित रखे है।

पर कहते हैं इंसान कितना ही मजबूत क्यूँ ना हो पर परिवार के आगे हार जाता है। जब बाला साहेब उम्र के आगे कम सक्रिय हो गये और शिवसेना का नया उत्तराधिकारी चुनने का समय आया तब उन्होंने काबिलियत को ना चुनकर पुत्र मोह चुना। यह बात सब जानते हैं कि बालासाहेब का उत्तराधिकारी सही मायने में कोई बन सकता था तो वह उनका भतीजा राज ठाकरे ही था। अगर शिवसेना में चुनाव द्वारा अध्यक्ष चुना जाता तो राज ठाकरे उद्धव को 100 में से 90 वोट लेकर हरा देते। शिवसेना जिस तरह की पार्टी है उसमें उद्धव कहीं फिट नहीं बैठते। उनमें वह आक्रमकता नहीं है, ना ही राज जैसी जनता से संवाद की शैली।
राज ठाकरे का व्यक्तित्व आकर्षक है, वह अंदर से नेता है।

बाला साहेब के सानिध्य में राज ठाकरे पुरी तरह बाला साहेब ठाकरे ही बन चुके थे। बोलचाल, भाषण शैली, आवाजों की नकल कर मंच जीत लेना राज में भी था। उन्होंने कभी कोई पद नहीं माँगा, निःस्वार्थ भाव से हर चुनाव में पुरी क्षमता से पार्टी का प्रचार करते। बाला साहेब का हर हुकुम वह चुपचाप मान लेते। लेकिन इमानदार और मेहनती व्यक्ति भले ही किसी पद का लालची ना हो लोकिन जब वह देखे कि उससे कम काबिल व्यक्ति उससे उपर जा रहा हो तब उसकी आत्मा विरोध करती ही है। यही हुआ ठाकरे परिवार में। अपने से कम प्रतिभावान उद्धव को अपना अध्यक्ष वह बर्दाश्त नहीं कर पाये। खुद महज चुनाव प्रचार करने वाले और अपनी मर्जी से एक भी उम्मीदवार खड़ा करने के अधिकार से वंचित राज ने अंततः बगावत कर ली और नयी पार्टी बनायी।

खुद को स्थापित करने के लिये हर पार्टी कोई ना कोई मुद्दा लेकर आती ही है। राज भी वैसे ही बिहारी बनाम मराठी लेकर आये। आज उनकी पार्टी कुछ खास ना कर पाने की वजह से एक असफल पार्टी हो गयी।लेकिन वह फिर भी वोट काटती है शिवसेना के। महज पुत्र मोह ने एक शानदार नेता खो दिया और एक मजबूत हिंदूवादी पार्टी भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिये लड़ रही है। कमजोर नेतृत्व और महाराष्ट्र में भाजपा के बढते प्रभाव ने शिवसेना को असुरक्षित कर दिया है।बाला साहेब के नाम और कुछ निचले स्तर पर अच्छे नेताओं की वजह सेसो पार्टी बची है। इसका ही असर है उसका रोज होता भाजपा से टकराव। हार्दीक पटेल को मुख्यमंत्री बनाने तथा शिवसेना के भाजपा से रिश्तों में आयी खटास पर अगली पोस्ट में।


(अब आगे)

कल आप ने पढा की कैसे एक काबिल और बाला साहेब के प्रतिबिंब राज ठाकरे को ना चुनकर बाला साहेब अपनी शिवसेना कम योग्य उद्धव ठाकरे को पुत्र मोह में देकर चले गये। इससे हुआ यह कि प्रभावी नेतृत्व ना होने की वजह से शिवसेना सिमटी जा रही है। बाला साहेब के नाम पर और कुछ निचले स्तर पर अच्छे नेताओं की वजह से थोड़ा बहुत दबदबा बाकी है। महाराष्ट्र की लगभग हर पार्टी महाराष्ट्रीयन गर्व और विकास की बात करने वाली पार्टी है। चाहे राकांपा हो, शिवसेना या मनसे।

भाजपा का नेतृत्व मोदी के हाथ आने से जितना खतरा विपक्षी दलों को सिमटने का है उतना ही उसकी सहयोगी पार्टीयों को भी है। भाजपा और शिवसेना लगभग एक जैसी विचारधारा की ही पार्टी है। दोनों के वोटर एक जैसे ही हैं। हिंदूत्व दोनों के एजेंडे में है,शिवसेना इसमें ज्यादा उग्र है। पर बाला साहेब के बाद इसमें नरमी आयी है। भाजपा का महाराष्ट्र में बढता असर शिवसेना के लिये चिंता का विषय बन गया है। मुख्यमंत्री फडनवीस भले ही लोकप्रिय नेता ना हों पर एक प्रतिभावान और मेहनती मुख्यमंत्री है। बिलकुल मोदी जी की तरह। उनकी साफ सुथरी छवी और सदैव विकास की ओर महाराष्ट्र को अग्रसर करने वाली कार्य प्रणाली उनको महाराष्ट्र के किसी भी नेता से अलग प्रस्तुत करती है।

शिवसेना के नेतृत्व में कमजोरी है और साथ ही अपने सहयोगी दल पर भरोसे की कमी। इसलिये भाजपा और महाराष्ट्र की जनता के समक्ष भाजपा का सहयोगी होते हुये भी आलोचक होना उसकी मजबूरी है। चुंकि राजनीति में कोई ना दोस्त है ना दुश्मन इसलिये भाजपा का राकांपा से बढती नजदीकीयाँ संकेत है कि शायद भाजपा और राकांपा साथ मिलकर अगली बार चुनाव लड़ें। वैसे यह पैतरा शिवसेना को हद में रखने के लिये आजमाया गया हो। इसी पर शिवसेना का पलटवार यह है कि वह गोवा, गुजरात, युपी जैसे राज्य जहाँ उसके पास कोई जनसमर्थन या फिर मामुली समर्थन है वहाँ वह भाजपा के वोट काटने पहुँच जाती है।

और अब आते हैं गुजरात में शिवसेना के हार्दिक पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करने पर। इसका नुकसान और फायदा दोनों है। नुकसान यह कि वह भाजपा के वोट काटेगी, फायदा यह कि शायद जो पटेल वोट भाजपा के खिलाफ गये हैं वह काँग्रेस और आप को मिलने के जगह शिवसेना को मिल जाये। हार्दिक पटेल गलत है या सही वह अलग विषय है पर उसे पटेलों का बड़ा समर्थन हासिल था। और अगर वह आज भी हार्दिक के साथ खड़े हैं तो वह उसे वोट भी जरूर देंगे। हार्दिक चुनाव लड़ेगा यह तय था। तो यह बेहतर हुआ कि वह काँग्रेस या आप में जाने की जगह शिवसेना में चला गया। इससे होगा यह कि शिवसेना चुनाव के बाद भाजपा के साथ गठबंधन कर ले। या हो सकता है यह सब कुछ अमित शाह की कूटनीति हो?

हालात वह नहीं रहे गुजरात में जो मोदी जी के समय हुआ करते थे। अगर वाकई हार्दिक पटेल शिवसेना में जा रहा है तो इसका नुकसान कम फायदा ज्यादा होगा।

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