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हिन्दुत्व के प्रति घृणा का इतिहास-8

कुछ लोग प्राचीन वैदिक भूभाग को ईरान से ले कर भारत तक विस्तृत मानते हैं और इसका राजनीतिक प्रयोग इस रूप में करते हैं कि ये भाग धीरे धीर हमसे कटते गए और इस विभाजन की अन्तिम कड़ी 1947 के विभाजन को मानते हैं।हम अपने साक्ष्यों से इसका खंडन होते पाते हैं।

हम दिखा आये हैं कि सिन्धु के पार का पूरा भूभाग वैदिक प्रभाव और संस्कृत भाषा से वंचित था। आज भी पंजाबी में उस बोली का प्रभाव बना रह गया है जिसमें घोष महाप्राण ध्वनियां नहीं थीं। सिंधु सौवीर के आर्यावर्त से बाहर रहने के विश्‍वास का उल्लेख हम पीछे कर आए है। गांधारों ने या कहें गन्धर्वों ने अपनी पण्यवस्तुओं के बदले में वाणी का वरण किया और उनका उस पर इतना अच्छा अधिकार हो गया कि देवों को वाणी को वापस बुलाने के लिए गा बजा कर उसे रिझाना पड़ा या मानक उच्चारण उनसे सीखने की जरूरत पड़ने लगी।

यह उन आर्थिक गतिविधियों की प्रखरता से संभव हुआ जिसका सही अनुमान केवल हड़प्पा के पुरातात्विक प्रमाणों से नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि खनिज संपदा के दोहन के स्थलों और क्षेत्रों पर पुरातात्विक पहचान संभव नहीं है, न संभव है स्थानीय जनों के विरोध, प्रतिरोध का सही अनुमान । परन्तु जब राहुल जी शालातुर निवासी पाणिनि को पठान कहते हैं तो अफगानिस्तान पर संस्कृत के प्रभाव का कुछ अनुमान हो जाता है। अफगानिस्तान के लिए आर्याना संज्ञा का प्रयोग होता था जो आज भी अफगान एयरलाइन के लिए प्रयोग में है। इसके बाद आता है आर्यों की सक्रियता का दूसरा क्षेत्र जिसे भी आर्याना कहा जा सकता है और जो ईरान बन गया आर्यों की यह संज्ञा ऐर्यानेम वैजा (Airyanem Vaejah) तक पहुंचता है ।

अफगानिस्तान के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र जिसे काफिरिस्तान कहा जाता था उसमें सोमरस के लिए विकल्प के रूप द्राक्षा रस निकाल कर उत्सव मनाया जाता था और इसे इन्द्र कुन या इन्द्रोद्यान की संज्ञा मिली थी! आज इसे नूरिस्तान या आलोक का देश कहा जाता है इसका पुराना नाम कामदेश था। धर्मान्तरण के मामले में इस्लामपरस्तों को सबसे कठिन संघर्ष इनसे ही करना पड़ा था । 1886 तक इसमें इस्लाम का प्रवेश नहीं हो पाया था। इन जनों को काफिर और इस क्षेत्र को काफिरिस्तान की संज्ञा भी उन्होंने ही दी होगी। इनमें इस्लाम न मानने वालों की संख्या बीसवीं शताब्दी तक बनी रह गई थी।

हम कह सकते हैं कि यह सबसे निकट का स्वर्ग या इन्द्रलोक था, वसुकन्नी या दजला की एक सहायक नदी वसु के तट पर बसी नगरी सबसे दूरस्थ स्वर्ग थी जिसकी समृद्धि के कारण इसका नाम संपदा की खान या वसुकन्नी पड़ गया था! इन नगरी का उल्लेख और इस पर असुरों के आक्रमण और उससे मुक्ति का हवाला गोपथ ब्राह्मण में आया है - वसोः धाराणां ऐन्द्र नगरम् ! तं असुरा परि उपेयुः ... बीच में ईरान और मध्येशिया में ऐसे बहुत सारे स्वर्ग या प्राचीररक्षित बस्तियां थीं।

आक्रामकता और नृशंसता के लिए कुख्यात जनों के बीच अपनी बस्तियां बसाना और अपनी गतिविधियों के चलते पूरे क्षे़त्र में अपनी भाषा और संस्कृति का प्रभाव डालना इनके प्रभुत्व, संगठन और शक्ति को प्रकट करता है। हो सकता है स्थानीय जन यायावरी के कारण आरंभ में बड़ी संख्या में संगठित न हो पाए हों और यह भी संभव है कि बाद में संगठन और नेतृत्व में वहीं बस गए और स्थानीय आबादी में खप गए ऐसे जनों का भी हाथ रहा हो, जो अपने स्‍वर्ग से बाहर न निकले हों, परन्तु इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे पास बहुत अधिक जानकारी नहीं है । वह हमारी विषयसीमा में भी नहीं आता।

परन्तु स्वर्ग के सुख, उसके भोग, उसकी जीवनशैली, उसकी अप्सराओं, संगीत और नृत्य से अपना मनोरंजन करने वाले इन्द्रदेवों का स्थानीय जनों पर क्या प्रभाव पड़ता रहा होगा इसका हम अनुमान ही लगा सकते हैं, क्योंकि उनकी पुरानी कथाएं इस्लाम के प्रभाव में दुर्लभ हो चुकी हैं और लेखन का प्रचार यदि सीमित रहा भी हो तो भी ईरानी में अवेस्ता को छोड़ कर किसी का लिखित साहित्य नहीं है।

अफगानिस्तान के उत्तरी भाग बदख्शां का पुराना नाम कोकनद प्रदेश था और कोकचा नदी जिसके पार संगमर्मर की पहाड़ियों में लाजवर्द की खानें है, और जिन तक इस नदी को पार करके ही पहुंचा जा सकता है, जाहिर है कोक नद के नाम से प्रसिद्ध था और इसी क्षेत्र में बसी बस्ती काइजिल कुम थी जहां से इन गतिविधियों का संचालन होता रहा लगता है।

मेरी समझ से ऋग्‍वेद में सरमा और पणियों के संवाद में चट्टानों में दबी जिन गायों/निधियों को बृहस्पति अंगिरा जनों की मदद से तोड़कर निकालते हैं(अयं निधिः सरमेे अद्रिबुध्नो गोभि: अश्‍वेभि: वसुभि: निऋष्टो । रक्षन्ति तं पणयो ये सुगोपा रेकु पदं अलकं आ जगन्थ ।। 10.108.7) ये उन चट्टानों से चमकती हुई बाहर आती है। यह बदख्शां की उन विख्यात लाजवर्द की खानों का प्रतीकात्मक चित्रण जिसमें पणियों द्वारा छिपा कर रखी गई निधि को वैदिक खनिकर्मी उनके विरोध के बावजूद खोद कर लाते हैं। इसमें इन गायों को सूप में जैसे जव भूसी से अलग किया जाता है उस तरह अलग करते दिखाया गया है। इनका वर्णन बहुत स्पष्ट और सटीक हैः( साधु अर्या अतिथिनीः इषिराः स्पार्हाः सुवर्णा अनवद्यरूपाः । बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितूर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः ।। 10.68.3).

हमारी रुचि केवल इस बात में है कि यदि पणिगण जिनके क्षेत्र में ये खानें आती हैं अपनी संपदा केे अपदोहन का विरोध करते हैं और यह धमकाते हैं कि हम इन्द्र को देख लेंगे, पर अपनी निधि को नहीं ले जाने देंगे और फिर भी विवश अनुभव करते हैं और यह सुझाव देते हैं कि इन्‍द्र आएं हम उनके साथ सहयोग करेंगे, उन्‍हें अपना सरदार बना लेंगे तो आरंभ में उनके संबंध वैदिक जनों से तनावपूर्ण ही रहे होंगे और अपनी लाचारी में धीरे धीरे, भले वैदिक धौंस को इस हद तक स्वीकार कर लिया कि उनको संस्कृत पर द्रविड़ लक्षणों वाले पंजाब की संस्कृत से अधिक अच्छा अधिकार हो गया तो दबे आक्रोश, विवशता और घृणा की भावना और उससे इनके लिए भर्त्‍सना और निन्‍दा परक प्रयोगों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

परन्तु सबसे मुखर है ईरान का दबा आक्रोश जो एक ओर तो वैदिक संस्कृति से इतनी गहराई तक प्रभावित हुआ कि यह वकालत की जाती रही कि यदि अवेस्ता की भाषा का उतना ही पुराना रूप उपलब्ध हो जितना पुराना ऋग्वेद है तो उसकी भाषा वैदिक से प्राचीन सिद्ध होगी और इस तर्क से उन्होने यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि इंडोईरानी की बाद की शाखा इंडो आर्यन है जब कि भारत से लेकर लघु एशिया से लेकर लिथुआनिया, लैटविया और यूगोस्लाविया तक और, ईरानी के तद्भवीकरण के अपवाद को छोड़, पूरे क्षेत्र पर वैदिक का एकक्षत्र साम्राज्य दिखाई देता है।

इसी तरह अवेस्ता की प्राचीनता को एक पूर्ववर्ती संस्कृति से निकला सिद्ध करने के लिए ठीक वही तर्क काम में लाया जाता रहा जिसे विलियम जोंस ने गढ़ा थाः
the religion of the Magi is derived from the same source as that of the Indian Rishis, that is, from the religion followed by the common forefathers of the Iranians and Indians, the Indo-Iranian religion. The Mazdean belief is, therefore, composed of two different strata; the one comprises all the gods, myths, and ideas which were already in existence during the Indo-Iranian period, whatever changes they may have undergone during the actual Iranian period; the other comprises the gods, myths, and ideaswhich were only developed after the separation of the two religions.( James Darmesteter, Intro. Zend Avesta, SBES part I)

अवेस्ता के कवि जरथुस्त्र या जरदुस्त्र का मूल नाम है जरद्वस्त्र या सुनहले बाने वाला कवि है । यह सुनहला रंग केसरिया या गैरिक वस्त्र है और इनका प्रवेश
सीधे भारत से नहीं, मध्येषिया से ईरान में हुआ था जहां वह पहले से बसे और अधिकार जमाए बांधवों या आर्यभाषा भाषी सेठों के माध्यम से अपना प्रभाव जमाते है। उन्होंने अपनी प्रतिभा और प्रभाव से पूर्ववर्ती वैदिक कर्मकांड आदि के विरुद्ध पर्यावरण तैयार किया था न कि पुराने धर्म और विश्‍वास की झलक उनमें पाई जाती हैः The priests of the ancient faith were now alarmed. They attempted to dissuade the prophet from disturbing the peace of the people. They met often to argue with him on the questions he was raising, but were foiled in the controversies. They felt themselves humiliated before the people and gave up meeting the prophet. They began to work against him and tried in all possible manners to frustrate the effect he was daily producing upon his hearers. They were accustomed to fatten upon the profits of the elaborate ceremonials and rich sacrifices that people offered under their guidance. They were renowned as exorcists who cast out demons, who read dreams, prognosticated the future, warded off the effect of the evil eye and, with ingenious charlatanism, had prospered among the credulous and superstitious. Zarathushtra reproved their greed and avarice. He exhorted the people to give up these superstitious practices and warned them that they were causing great harm by following such false teachers.39 His denunciation of their practices made them furious and now they sought his ruin. They accused him of preaching doctrines that were subversive of the religion of their forefathers and the established form of worship, and of blaspheming their gods. They incited the people to oppose him and made frantic appeals to the rulers of the land to drive him out from their midst.
Zarathushtra's heart was burning with indignation against these hypocrisies. With his holy spirit aglow with righteous wrath, he called these Pharisees and Scribes of Iran, Kavis and Karapans or seeingly blind and hearingly deaf. These terms belong to the Indo-Iranian period and were evidently used in a good sense, before the Aryan groups separated. They share the fate of the cardinal word daeva and are assigned derogatory meaning in the Gathas. The Vedic hymns use the word kavi in the sense of a sage. It is freely applied to the seers and to Soma priests. It is further used as an epithet of gods. Agni, in particular, bears this honoured title.40 In the Gathas the word is curiously used with a double meaning. It is given a bad connotation whenever it is applied to the priests of the Daeva-worshippers. But the second Iranian dynasty is known as the Kavi or Kianian [Kayanian]. Its renowned kings who lived before the coming of Zarathushtra were Kavi Kavata, Kavi Usa, and Kavi Haosrava. Even Vishtaspa, who later became the royal patron of the new religion, retains this title and Zarathushtra speaks of him as Kavi Vishtaspa.41 It is significant, however, that Vishtaspa is the last king who shares this epithet with his royal predecessors. The kings who succeed him and with whom the dynasty dies out do not share the title. To the class of the Kavi belong the Karapan, corresponding to Skt. kalpa, 'ritual,' and the Usij, Skt. ushijah.

यहां हम इस विषय पर चर्चा करें तो बहक जाएंगे। संक्षेप में यह कहना ही पर्याप्त है कि वैदिक समाज के प्रति ईरानियों की घृणा इस हद तक है कि देव /दएव/शब्द ही इसमें दुष्टता का या शैतानी का पर्याय बन जाता है और इन्द्र की भी निन्दा की जाती है। सबसे रोचक है मागियों या मगों का वहां प्रभाव भी है जो भारतीय भूभाग में दलित बनने को बाध्य हुए! यहां उनकी उपस्थिति छठीं सहस्राब्दी ईपू से महगरा, मगहर आदि स्थायी बस्तियों से प्रमाणित होती है। यदि उस संघर्ष के फलस्वरूप उन्हें भारत से बाहर जाना पड़ा हो या यदि भारत की तरह ही उनके जत्थे ईरान तक पहले से बसे रहे हों और ईरानी क्षेत्र में उनका प्रभाव बढ़ा हो, तो यह हमारी ज्ञानसीमा से बाहर की बात है। इस पर गहनता से काम करने के बाद ही यह पेच सुलझ सकता है।

घृणा के ये बीज यदि शोषण दोहन और दंभ प्रदर्शन के कारण भारत से बाहर भारतीयों के विषय में बने रहे हों तो यह बात समझ में आती है, परन्तु सांस्कृतिक अग्रता, शिष्टता और न्यायप्रियता से भी घृणा पैदा हो सकती है इसकी चर्चा हम कल करेंगे।

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