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आक्रमण के हथियार बदल गए हैं-भाग 18

क्लास फिफ्थ में एक कहानी पढ़ाई जाती है....कभी पढ़ा क्या??
"""एक बार एक शिक्षक महोदय बच्चों को कुछ सीखा रहे थे।उन्होंने एक छोटे बरतन में पानी भरा और उसमें एक मेंढक को डाल दिया। पानी में डालते ही मेंढक आराम से पानी में खेलने लगा। अब अध्यापक ने उस बर्तन को गैस पर रखा और नीचे से गर्म करना शुरू किया।
जैसे ही थोड़ा तापमान बढ़ा तो मेंढक ने अभी अपने शरीर के तापमान को थोड़ा उसी तरह adjust कर लिया। अब जैसे ही बर्तन का थोड़ा तापमान बढ़ता तो मेंढक अपने शरीर के तापमान को भी उसी तरह adjust कर लेता और उसी बर्तन में मजे से पड़ा रहता।धीरे धीरे तापमान बढ़ना शुरू हुआ, एक समय ऐसा भी आया जब पानी उबलने लगा और अब मेंढक की क्षमता जवाब देने लगी। अब बर्तन में रुके रहना संभव ना था। बस फिर क्या था मेंढक ने बर्तन से बाहर निकलने के लिए छलांग लगायी लेकिन अफ़सोस ऐसा हो ना सका। मेंढक अपनी पूरी ताकत लगाने के बावजूद उस पानी से भरे बर्तन से नहीं निकल पा रहा था क्यूंकि अपने शरीर का तापमान adjust करने में ही वो सारी ताकत खो चुका था।

कुछ ही देर में गर्म पानी में पड़े पड़े मेंढक ने प्राण त्याग दिए।अब अध्यापक ने बच्चों से पूछा कि मेंढक को किसने मारा तो कुछ बच्चों ने कहा – गर्म पानी ने……लेकिन अध्यापक ने बताया कि मेंढक को गर्म पानी ने नहीं मारा बल्कि वो खुद अपनी सोच से मरा है।जब मेंढक को छलांग मारने की आवश्यकता थी उस समय तो वो तापमान को adjust करने में लगा था उसने अपनी क्षमता का प्रयोग नहीं किया लेकिन जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया तब तक वह कमजोर हो चुका था।
'कैराना.....काश्मीर…...हिन्दू...धर्मांतरण,लव जेहाद पर कुछ करने की जरूरत नही।
बस।ये वामिये-सामिये-कामिये-सेकुलरिये आपको एडजस्ट करा रहे हैं ''मेढ़को,।आपके काहिली-भरे टाल-मटोल वाले स्वभाव को आपके ही खिलाफ एक हथियार के तौर पर उसका उपयोग हो रहा है।

आप सबलोग आज कल दो चीज़े देख रहे होंगे सोशल मीडिया पर भी और main stream मीडिया में प्रायः ऐसी’खबरे चल रही होती है,की मुसलमानो(नाम-सहित) ने गरीब पंडित का दाह संस्कार किया।मुसलमानो ने गरीब हिन्दू लड़की की शिक्षा का बीड़ा उठाया।मुसलमानो ने दलित परिवार को आसरा दिया इत्यादि इत्यादि।जब वहाँ काश्मीर मे रोज आग लगा रहे थे,तीर्थ यात्रियो का जीना-हराम किए थे,तो कुछ चैनल खबरे चला रहे हैं“मुस्लिम महिला ने चुपके से दिया अमरनाथ यात्री को खाना खिलाया।
व्हाट्सएप्स ग्रुपो में भी ऐसे मैसेज खूब आते है।
वहां आग लगी है….मुस्लिमों ने हिन्दू की शादी करवाई।…..सारे यात्रियों की जान पर पड़ी थी पूरा काश्मीर टुटा पडा था और ये खबर बना रहे….मेनुपुलेट कर रहे।……लगभग हर जिले से तीर्थयात्री वहां गए थे। मोबाइल के जमाने में तुम क्या दबा-छुपा मेनूपुलेट कर रहे हों।अब कुछ नही छुपता।.न्यूज के पीछे छुपा व्यूज नए लड़के पहले ही ताड़ लेते हैं और तुम्हारी जम कर हंसी उड़ाते हैं……और जिनके लिए कर रहे होते हो वह अगले चरण की ‘तैयारी,, में लग जाते हैं।हिन्दू तो स्वभावत: इतनी मदद रोज करता है।कही उन्होने कर दी तो इतना ढिढोरा किस बात का?इस तरह की ‘कौमी एकता, के ‘नाटकीय मिसाल,पूरी तरह अविश्वसनीय तो बना ही चुके हैं सामान्य हिन्दू मानस को केवल पीड़ा देते हैं।
किस युग और मानसिकता में जी रहे हो तुम।अब लोग …इसके पीछे की रणनीति भी अच्छी तरह जानते हैं।बिलकुल पिछले सत्तर साल की मुम्बईया फिल्मों,वामपंथी सेकुलरिया लेखन(साहित्य,उपन्यासो,कहानियों) की ‘योजनाबद्ध साजिशी तर्ज पर,जिनमें हिन्दू तो बुरा दिखाया जाता है या फिर जातीय किन्तु मुस्लिम और पादरी की इमेज बिल्ड की जाती है।दरअसल यह हो क्या रहा है सभी समझने की कोशिश करिए।

नाम नही लिखूंगा ‘टाइप्ड,है(अगल-बगल देखकर खुद ही समझ लें)व् लगभग अमूमन सारे मुस्लिम पत्रकार,वामी पत्रकार जानबूझ कर पहले एक वेब चैनेल से ऐसी खबर चलाते रहते है।, उसको ‘खानदानी चैनल,अखबार और अन्य न्यूज़ एजेंसिया भी वहां से उठा लेते है।वहां उनके लोग पहले से मौजूद हैं।कुछ ”चीप से नेता,, इसे लपक लेते हैं।देश भर में जब-जब आतंकवादी घटनाये होती हैं।जब हिन्दू मारे जा रहे होते हैं।सताये जा रहे होते हैं,उनकी खबर परवान चढ़ रही होती है।तत्काल यह गैंग सक्रिय होता है।इस तरह की छोटी-मोटी घटनानाये बाकायदा तैयार करवाके गढ़ी जाती हैं।.ये खबरे जबरदस्त तरीके से प्रसारित की जाती हैं।ढेरों चैनलों और समाचार-पत्रो में प्रमुखता से छपवाये जाते हैं।इनकी आड़ में मुख्य खबर और तमाम सच्चाई मीडियेटिक चेंज दे दिया जाता है।उनको फेट,धुंधला करने की कोशिश साफ़-साफ़ दिखती है।मैं ये नही कह रहा कि कौमी एकता की खबरे न छपें….बस सच्चाई न दबे।उसे मेनुपूलेट करके हलका करना खतरनाक होता है।आखिर इस दोहरी मानसिकता का क्या मतलब?

अपनी खबरों से हिन्दू को जातिवार नाम लिखेंगे।मुस्लिमो के नाम गायब कर उसे फर्जी सेकुलर रंग का सिद्धान्तिक जामा बताएँगे।चुनाव के दौरान हिन्दुओ को तो अलग-अलग जातीयमत प्रतिशत निकाल कर दिखाएंगे लेकिन मुस्लिम को एक-मत से।इसका सीधा सा अर्थ निकलता है कि मीडिया प्रिज्युडिस है कि हिंदू मत बांटना ही है।दुसरी तरफ सेकण्ड शैड की स्थिति में जोर-शोर से नाम के साथ प्रचारित करेंगे।क्या सोचते है यह घटिया सोच लोग नही पकड़ पायेंगे।उसके पीछे ‘रणनीतिक मीडिया मैनेजमेंट न हो।जिसकी कीमत गत सत्तर साल से शिक्षा और मीडिया के मेनुपुलेशन द्वारा केवल एक ही समाज चुका रहा है।

उनको खबरों के बाद की कहानी पर भी नजर डाले फिर कुछ NGO उसकी cutting करके भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में भेजते है। tata institute ऑफ social sciences जैसे संस्थान उसके ऊपर केस स्टडीज करवाते है।लिटरेचर लिखवाया जाता है।पूरे इण्डिया से ऐसी खबरों का एक जगह संकलन करके उसका documentation किया जाता है।कांग्रेस और सेकुलरिया सरकारें तो बाकायदा आर्थिक प्रोत्साहन देती रही हैं।बहुसंख्यको के शोषण पर उस डॉक्यूमेंटेशन पर भी कई किताबे लिखी जाएंगी,उनका विमोचन होगा,लिटरेररी फेस्ट में इसकी चर्चा होगा।इसको और महत्त्वपूर्ण सेकुलर तस्वीर बनाकर पेश किया जाता है।इन तस्वीरों के नीचे ‘हिन्दू-दमन और मिनी पाकिस्तान की खौफनाक आतंकी गतिविधियाँ छुपा ली जाती है।यही भविष्य का इतिहास कहा जाएगा। हिन्दू थोडा और घट जाता है।बड़ी खूबसूरती से वे ‘दारुल-ए-इस्लाम,की तरफ एक कदम और बढ़ा लेते हैं।कमोबेश ईसाई मिशनरियां भी इसी तर्ज पर काम करती हैं।…..और आज से पांच साल बाद आप लोग इस बात को साबित नहीं कर पाएंगे की मुसलमान-ईसाई खराब और क्रूर होते है।इस टीआरए जबकि घटनाये हजारों की संख्या में घट रही…पर समाचारों में एक छद्म नीति का शिकार हो रही हैं…या तो खबर ही गायब होती है या उनमे से नाम गायब करके या खबर को हल्का कर देते हैं…क्योकी एक छद्म एजेंडे के तहत अखबार और चैनल ‘हिन्दू दमन,, पर नाम सहित खबरे नही छापते…..वे बड़ी धूर्तता से उसे सेकुलरिज्म का जामा पहना देते हैं।इसके विपरीत दूसरी खबर चलाई जाएंगी की।गाय को लेकर दलितों को पीटा गया……..मुसलमानो को गोबर खिलाया गया,दलितों को मंदिर में घुसने नहीं दिया गया।आप लोग भी सोशल मीडिया पर खुश होंगे की मुसलमानो के साथ ऐसा ही होना चाहिए।ऐसी खबरों को भी ठीक वैसे ही माध्यम जिसको की मैंने ऊपर बतलाया है document किया जाएगा।
पांच साल बाद ये साबित हो जाएगा की इस देश में दरअसल हिन्दू ‘मुसलमान और दलितों,, को जीने नहीं दे रहा था….बड़ा ही तानाशाही रवैया था।

सच्चाई ये है बहुत से मुसलमान दलितों के ऊपर अत्याचार करते है।उनकी लड़कियो का बलात्कार करते है।ऐसी स्थित में प्रमुख दैनिक व् चैनल यही छापते है की “दबंगो ने किया दलित-युवती का बलात्कार ।“मुस्लिम या ईसाई नाम छुपाने की कोशिश करते हैं।पत्रकारिता का जाने कौन सा मानदंड है जो केवल इण्डिया के पत्रकार अपनाते हैं।बेसिकली दलित लिखकर वे आपको समाज को टुकड़ो मे बाँट कर कमजोर करते है।यह एक हथकंडा है। दुनियां के सभी हिस्सों में इसे ‘घटिया पत्रकारिता, कहा जाता है।अमेरिका-रूस-चीन मे इस तरह की पत्रकारिता पर जेल मे डाल देने की प्रथा है। पर संगठित हिन्दू समाज इस सुनियोजित-तौर-तरीके का सामना नही करता।कभी कोई हमारे हिन्दू वादी संगठन एक चिट्ठी भी लिख कर पूछता है अख़बार के संपादक से की आपने किस बिना पर ये हैडिंग दी?संगठन को छोड़ दीजिये कोई हिन्दू व्यक्ति भी अखबार से सवाल पूछता है।

हमारे संगठन इस मामले में बहुत ही ढीला रवैया अपनाते है।उनके पास इससे रिलेटेड कोई कार्य-प्रणाली नही है।हालांकि सोशल मीडिया के आने के बाद इस तरह के खबरों की हकीकत तुरन्त सामने आ जाती है।न्यूज और व्यूज की थ्योरी कमोबेश आम पाठक भी भांप लेते हैं।हिन्दू संगठन के लोगों को भी इस तरह के समाचारों पर कम्प्लेंट और कमीशन से केस के बारे में जानकारी लेना चाहिए।RTI से यह स्टेट वाइज़ आंकड़े इकट्ठा किया जाये कि दलितों पर कौन अत्याचार वाकई कर रहे हैं, उसमें किसका परसेंटेज कितना है।अमूमन हिन्दुओ को जाति में ही बाँट कर भारतीय मीडिया क्यों चलती है. जिला-स: कम्लेंट और कार्रवाई के बाद मीडिया भी इस पर वास्तविक जिम्मेदारी निभाने लगेगा।हिंदू संगठन भी अपनी कोई fact finding टीम घटनास्थल पर भेज के घटना को डॉक्यूमेंट आदि तैयार रखे।अपने कार्यकर्ताओं की एक टीम इस पर लगातार सक्रिय रखना चाहिए।फिलहाल जान लीजिये कोई संगठन इसके विरोध के लिए अपने resources और वैज्ञानिक-संवैधानिक तरीके नही अपना रहा।सब हाथ पर हाथ दिए बैठे है।आप लिस्टिंग करिए रोजगार,अपराध,द्ब्ङ्गई,राजनीति,लेखन,छोटे-छोटे व्यापार,कब्जावादी पैंतरो,हड़प के साथ सैकड़ो ऐसी हमले दिखेंगे आप जिन्हे आप नही पहचानाते पर समय के साथ दुनिया बदल चुकी है युध्द के तरीके भी।अगर रिहाई मंच बना कर आतंक-वादियो की पैरवी हो सकती है।तो वकीलो का संगठन बना कर देश का बहुसंख्यक समाज अपने पुरुखों की थाती क्यों नही बचाता??

वैसे इस बीच कुछ समूह जरूर आगे आये हैं जो खण्डन-मंडन और ‘वैधानिक कार्यवाही, पर जोर दे रहे हैं और मदद की कोशिश भी।हम लोग इस पर लिख रेहे,बात कर रहे इस लिए कह सकते हैं आशा की किरणे शेष है।फिलहाल हमें इस मामले में ईसाई और मुसलमानों,वामपंथियो से भी सीखना चाहिए।करना क्या चाहिए।हममे से कोई एक प्रेस कांफ्रेंस करता और बाकायदा पिछले सारे ‘पत्र व्यवहार, का सन्दर्भ देकर कहता की हम पिछले इतने सालो से फला अखबार या चैनेल को आगाह कर रहे थे की ऐसी रिपोर्टिंग न करो।लेकिन किसी के पास कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं होता है।अपने आक्रोश,संताप या आग्रह को साबित करने का जो काम हम बैठे-बैठे कर सकते हैं वह तो करें।आप अपने घर से ही इसे करके अपना हथियार तैयार रखे।अब युद्ध के हथियार बदल चुके है।कम से कम हमे सजग रहना चाहिए।लगातार।स्वामी विवेकानन्द जी कहते है जाग जाइए,उत्तीष्ठत,जागृत,प्राप्यवरान्निबोधत! वे तरह-तरह के,लेखन,मनोरंजन,शिक्षा के हथियारो से सेकुलरिज़्म की गोली देकर आपको सुला रहे है।आपका सोते रहना उनके लिए फायदेमंद जो है।

(आगे पढ़िये-भाग-19)

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